वैशाली जिले के एसपी मानवजीत सिंह ढिल्लो ने बताया कि पूर्व में पकड़े गए नौ डकैतों की निशानदेही पर पुलिस काफी दिनों से इनकी तलाश कर रही थी. गिरोह का मास्टरमाइंड जेल में है. इस कारण गिरोह के सदस्य लूट के बचे सामानों को ठिकाना लगाने की ताक में थे. इसी दौरान पुलिस ने मोबाइल सर्विलांस के जरिये सभी डकैतों को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की. इस गैंग में बिहार, झारखंड के कई जिलों के डकैत शामिल थे. यह गैंग विदेशों में रहने वाले एनआरआई और डॉक्टरों के घरों को निशाना बनाता था.

रुपया जितना गिरना चाहे, उतना गिर जाने दें

घाटे का सौदा
अभी एक बार फिर 1991 के विदेशी मुद्रा संकट एक सफल विदेशी मुद्रा व्यापारी बनने का राज जैसी स्थिति बन रही है। आयात बढ़ रहा है और निर्यात दबाव में है। 1991 में इस समस्या को रुपये का अवमूल्यन करके निबटाया गया था। इस बार सरकार का प्रयास है कि आयात और निर्यात के फासले को विदेशी निवेश के माध्यम से पाट लिया जाए। इस बात को एक उदाहरण से समझें। मान लीजिए व्यापारी की मासिक आय 10 हजार और खर्च 12 हजार रुपये है। ऐसे में उसके पास दो उपाय हैं। एक उपाय है कि वह अपने खर्च कम करे। कार के स्थान पर स्कूटर का उपयोग करे तो खर्च कम हो जाएगा और कांटा मिल जायेगा। दूसरा उपाय है कि वह हर माह अपनी कंपनी के दो हजार रुपये के शेयर बेच दे। लेकिन कंपनी के शेयर खरीदने को निवेशक कम ही तैयार होंगे क्योंकि घाटे में चलने वाली कंपनी एक सफल विदेशी मुद्रा व्यापारी बनने का राज के शेयर कम खरीदे जाते हैं।

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पीएफ़एमएस (सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली)

सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) वित्त मंत्रालय, भारत सरकार की एक पहल है जो सरकारी वित्तीय प्रबंधन प्रणालियों में परिवर्तनकारी जवाबदेही और पारदर्शिता लाने और भारत में समग्र सुशासन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आधार आधारित और गैर-आधार आधारित दोनों बैंक खातों के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी)/ गैर-डीबीटी भुगतान के ई-भुगतान के लिए एक वेब आधारित एप्लिकेशन प्रदान करती है।

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बेटी की फीस भरने के लिए बना डकैत, NRI परिवारों को बनाता था निशाना

गिरफ्त में आरोपी

  • पटना,
  • 09 सितंबर 2018,
  • (अपडेटेड 09 सितंबर 2018, 4:29 PM IST)

बिहार पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी है. उसने एक ऐसे गिरोह को धर-दबोचा है जिसने बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के एनआरआई की नींद उड़ा रखी थी. यह गिरोह केवल एनआरआई के घरों पर ही डकैती डालता था. दिलचस्प बात यह है एक सफल विदेशी मुद्रा व्यापारी बनने का राज कि डकैतों के इस गिरोह में एक शख्स ऐसा भी है जो अपनी बेटी की स्कूल की महंगी फीस भरने के लिए यह काम करता है.

बहरहाल, हाजीपुर में गिरफ्तार डकैतों के इस गिरोह के पास से पुलिस ने लूट के 10 लाख रुपये, भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा, आधा किलो से अधिक सोने के जेवरात और चांदी का सामान के साथ डायमंड भी बरामद किया है. साथ ही इनके पास से दो देसी पिस्टल, 6 कारतूस और एक टाटा सूमो गाड़ी बरामद की गई है. बताया जा रहा है कि चारों डकैतों की गिरफ्तारी उस वक्त हुई जब वे लूटे गए सामान को ठिकाने लगाने की फिराक में थे.

आजादी के 75 साल तब और अब: दुनिया की तीसरी बड़ी इकॉनमी बनने की ओर बढ़ रहा देश

आजादी के 75 साल तब और अब: दुनिया की तीसरी बड़ी इकॉनमी बनने की ओर बढ़ रहा देश

1965 में भारत में अमेरिकी सरकार के एक अमेरिकी रिसोर्स इकोनॉमिस्ट लीस्टर ब्राउन ने अपना पूरा करियर ही तब दांव पर लगा दिया था जब उसने भारत में अनाज उत्पादन की गणना कर अनाज की किल्लत से होने वाली तबाही की आशंका जताई थी और अमेरिकी सरकार को तब तक के सबसे बड़े फूड शिपमेंट के लिए तैयार किया था. अब साल 2022 में वही भारत दुनिया भर के कई देशों को निश्चित खाद्यान्न संकट से बचा रहा है. बीते 7 दशक से ज्यादा वक्त में भारत दुनिया के सबसे गरीब मुल्क से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन चुका है. और एक सफल विदेशी मुद्रा व्यापारी बनने का राज फिलहाल देश दुनिया के टॉप 3 अर्थव्यवस्था में शामिल होने की दिशा में बढ़ रहा है. इस कामयाबी के लिए दशकों से भारतीयों की मेहनत और लगन मुख्य वजह है. जानिए बीते 75 सालों में देश की अर्थव्यवस्था में क्या बदलाव हुआ है.

खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुआ भारत

आजादी के बाद लगातार कई साल सूखे की मार और खाद्यान्न की कमी सहने वाला भारत अब दुनिया भर के देशों को खाद्यान्न का निर्यात कर रहा है. 1960 तक भारत पूरी तरह से खाद्यान्न में आयातक की भूमिका में था. आंकड़ों पर नजर डालें तो 1950 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 5.49 करोड़ टन के स्तर पर था. जो कि अब यानि 2020-21 में बढ़कर 30.5 करोड़ टन के स्तर पर पहुंच गया है. पिछले कई सालों से गेहूं, चीनी सहित अन्य में भारत लगातार रिकॉर्ड स्तर पर उत्पादन कर रहा है.

साल 1947 में जब भारत आजाद हुआ था तो उसकी जीडीपी सिर्फ 2.7 लाख करोड़ रुपये की थी. जो कि दुनिया की जीडीपी का 3 प्रतिशत से भी कम हिस्सा था. फिलहाल रियल जीडीपी 150 लाख करोड़ रुपये के करीब है. यानि जीडीपी 55 गुना बढ़ चुकी है. इसका दुनिया भर की जीडीपी में हिस्सा 2024 तक 10 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान है. बीते 75 साल में भारत की जीडीपी में लंबी अवधि के दौरान स्थिर बढ़त का रुख रहा है. सिर्फ तीन मौके ऐसे आए जब अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य से नीचे रही है. पहली बार 1965 के दौरान, दूसरी बार 1979 के दौरान और तीसरी बार 2020 में महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था में गिरावट देखने को मिली.1960 से 2021 के जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1966 से पहले ग्रोथ का औसत 4 प्रतिशत से नीचे था. वहीं 2015 के बाद से औसत ग्रोथ 6 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है.

कैसी रही अर्थव्यवस्था की चाल

विश्व बैंक की रिपोर्ट में जारी आंकड़ों पर नजर डालें तो समय के साथ साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती साफ तौर पर दिखती है. अर्थव्यवस्था में उतार चढ़ाव पर नजर डालें तो 1992 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थिरता का रुख है. 1947 से 1980 के बीच अर्थव्यवस्था की ग्रोथ 9 प्रतिशत से लेकर -5 प्रतिशत के दायरे में रही. यानि इसमें काफी तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला. 1980 से 1991 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था और संभली. इस दौरान अर्थव्यवस्था एक बार भी शून्य से नीचे नहीं पहुंची और 9 प्रतिशत से ऊपर की अपनी रिकॉर्ड ग्रोथ भी दर्ज की. वहीं अगर महामारी का दौर छोड़ दें तो 1992 से 2019 तक जीडीपी ग्रोथ 4 से 8 प्रतिशत के दायरे में ही रही है. यानि समय के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थिरता के साथ मजबूती रही है.

75 सालों की सबसे बड़ी उपलब्धि देश में गरीबों की संख्या में कमी आना है. भारत जब आजाद हुआ था तो देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या बेहद गरीबी में जी रही थी. 1977 तक एक सफल विदेशी मुद्रा व्यापारी बनने का राज ये संख्या घटकर 63 प्रतिशत तक पहुंची. 1991 के सुधारों के साथ देश में पहली बार आधी जनसंख्या गरीबी रेखा से ऊपर पहुंच गई. 2011 के आंकड़ों के अनुसार देश में 22.5 प्रतिशत लोग बेहद गरीबी में रह रहे थे. लेबर फोर्स सर्वे 2020-21 के मुताबिक वित्त वर्ष 2021 के अंत तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या घटकर 18 प्रतिशत से नीचे आ जाएगी. सर्वे के ये अनुमान वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के अनुमानों की ही दिशा में हैं. जिन्होने भी देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के अनुमान 20 प्रतिशत से नीचे दिये हैं.अगर यूएनईएससीएपी की 2017 की रिपोर्ट पर नजर डालें तो सिर्फ 1990 से 2013 के बीच भारत में करीब 17 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल गए हैं. फिलहाल महामारी की वजह से गरीबों की संख्या में कुछ दबाव देखने को मिला है, हालांकि यूएन की रिपोर्ट में माना गया है कि भारत की स्थिति दूसरे अन्य विकासशील देशों से बेहतर रहेगी.

कहां पहुंचा विदेशी मुद्रा भंडार

फिलहाल दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की मजबूती इस आधार पर तय हो रही है कि उसके पास विदेशी मुद्रा भंडार कितना है, भारत ने इस मामले में काफी तेज ग्रोथ दर्ज की है. देश का विदेशी मुद्रा भंडार फिलहाल 46 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है जो कि दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा रिजर्व है. हालांकि आजादी के बाद देश की स्थिति इस मामले में काफी कमजोरी थी. 1950-51 में देश का फॉरेक्स रिजर्व सिर्फ 1029 करोड़ रुपये के स्तर पर था. 1991 तक विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति काफी नाजुक हो गई थी. इस दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब भारत के पास सिर्फ 3 हफ्ते के इंपोर्ट के बराबर ही विदेशी मुद्रा भंडार था. इस संकट की वजह से ही देश में सुधारों की शुरुआत हुई और इस का फायदा ये मिला कि फिलहाल देश का विदेशी मुद्रा भंडार ऊंचे फ्यूल बिल के बावजूद 10 महीने से ज्यादा के इंपोर्ट बिल के लिए पर्याप्त है.

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